लालबत्ती का नियम

देश में लालबत्ती का नियम अब बदल गया है। एक मई 2017 से देश में लालबत्ती का इस्तेमाल बंद कर दिया गया है। अब अगर केंद्र या राज्य में कहीं भी कोई वीआईपी या वीवीआईपी यानी गणमान्य व्यक्ति या हस्ती अपने वाहन पर लालबत्ती का इस्तेमाल कर सकता। चाहे राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री, कोई मंत्री या संतरी देश में किसी को भी अपने वाहन पर लालबत्ती लगाने का अधिकार नहीं है और अगर वह ऐसा करता है तो अपराध है। 
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने इस आशय का फैसला किया। सरकार ने कहा कि उसने देश में स्‍वस्‍थ लोकतांत्रिक मूल्‍यों को सशक्‍त बनाने के उद्देश्‍य से यह कदम उठाया है क्योंकि उसका स्‍पष्‍ट मानना है कि वाहनों पर लगी बत्तियां वीआईपी संस्‍कृति का प्रतीक मानी जाती हैं और लोकतांत्रिक देश में इसका कोई स्‍थान नहीं है।
दरअसल इस आशय का फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। 19 अप्रैल 2017 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक के बाद वित्त मंत्री अरूण जेटली ने घोषणा की। उन्होंने कहा- निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री का फैसला है। उन्होंने इस बारे में मंत्रिमंडल को सूचना भर दी। जेटली ने कहा कि सरकार इस मामले में केंद्रीय मोटर वाहन अधिनियम, 1989 में जरूरी बदलाव करेगी।

इसी संदर्भ में 30 अप्रैल 2017 को मोदी ने अपने मन की बात कार्यक्रम में कहा कि गाड़ियों से तो लालबत्ती हटी लेकिन दिमाग से हटाना बाकी है। उन्होंने देश में वीआईपी की जगह ईआईपी (एवरी पर्सन इज इंपोर्टेंट) का नारा दिया।

सिर्फ इन्हें है छूट: आपातकालीन और राहत सेवाओं, एम्‍बुलेंस, अग्नि शमन सेवा आदि से संबंधित वाहनों पर नीली बत्ती लगाने की अनुमति है।
नियम की बात: अगर नियम की बात की जाए तो वाहनों पर लाल व नीली बत्ती कौन लगाएगा यह तय है। मोटर वाहन नियमावली 1998 के नियम 108(1-तृतीय) के तहत केंद्र व राज्य सरकारों को वाहनों में लाल बत्ती लगाने वाली हस्तियों या विशिष्ट जनों की सूची तैयार करने का अधिकार है। वहीं इसी कानून की धारा 108(2) के तहत राज्यों को अपनी गाड़ी पर नीली बत्ती लगाने योग्य अधिकारियों की सूची जारी करने का अधिकार है।

अदालत की पहल: सरकार ने लालबत्ती को समाप्त करने का फैसला तो अप्रैल 2017 में किया लेकिन देश की शीर्ष अदालत यानी उच्चतम न्यायालय इस दिशा में कई साल पहले ही पहल कर चुका था। उच्चतम न्यायालय ने 10 दिसंबर 2013 को कहा था कि लालबत्ती व सायरन का इस्तेमाल सीमित करने यानी इनका दुरुपयोग रोकने के लिए कदम उठाए जाएं। न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र शासित प्रदेश और राज्य सरकारों से कहा था कि वे इस बारे में अपने अपने नियमों में बदलाव करें और नयी सूचियां तैयार करें।

इसके बाद 2014 में अदालत ने लाल बत्ती को स्टेट्स सिंबल बताया और 2015 में केंद्र सरकार से कहा कि वह यह अधिकार पाने वाली हस्तियों की सूची छोटी करे। न्यायालय का कहना था कि वाहनों पर लाल बत्ती की इजाजत केवल संवैधानिक पद पर आसीन लोगों और उच्च पदस्थ हस्तियों को ही दी जानी चाहिए ताकि स्थानीय नेता प्रतिष्ठा के प्रतीक के रूप में इसका दुरुपयोग नहीं करें। यह अलग बात है कि मोदी सरकार ने ऐतिहासिक फैसला करते हुए लालबत्ती की व्यवस्था को ही समाप्त कर दिया।
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